सोमवार, 24 दिसंबर 2012

देश का स्वरुप



वक़्त बदल रहा है, 
मौसम बदल रहा है.
हर किसी का ख्वाब यहाँ, 
भट्टी में जल रहा है.

कही लूटी जाती है आबरू, 
कोई भूख से मर रहा है.
जान बाकि नहीं है देश में,
पर देखो ये फिर भी चल रहा है.

कही पर गरीब-नंगे लोग यहाँ,
कही पर होते करोड़ो के घोटाले,
इस देश को चला रहे है, 
जो हैं इसे डुबोने वाले.

किसी को रहने को घर नहीं,
कोई लाखो के सौचालय बनवा रहा है,
रूह कांप उठती है ये देख कर,
भाई भाई का खून बहा रहा है.

जहा भी देखो देश में, 
बस भ्रष्टाचार का बोल बाला है,
दामन हैं सबके साफ़ यहाँ,
बस हृदय ही इनका काला है.
परवाह नहीं इनको की कोई,
आग पर चल रहा है.
इस देश का अब स्वरुप बदल रहा है.

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