रविवार, 28 अक्टूबर 2018

चलो साथ मेरे

चलो साथ मेरे,
जब तक मंजिल ना मिले,
दो कदम तुम चलो
दो कदम हम चले
यूँ ही सुबह गुजर जाए
बस यूँ ही शाम ढले
गर्म धूप में हम
बन कर ठंडी छाव चले
फिर वो मंजिल की दूरी
कभी दूर ना लगे लगे
पकड़ कर एक दूसरे का हाथ 
जब कभी हम साथ चले

सोमवार, 22 अक्टूबर 2018

जितने भी काफिले निकले

मंज़िल की तरफ जितने भी काफिले निकले
खुदा गवाह है उनके दिलो में भी फासले निकले

जो बातें करते थे हमेशा फूलो और खुशबू की
उनके होठों से भी जब निकले तो काटें निकले

पत्थर हो गया है इस जमाने में लोगो का दिल
मैय्यत में भी निकले तो हँसते हुए निकले

क्या बयाँ करे 'साहिल' इस जमाने की बात
लोगो के हाथो में फूल और बगल में खंज़र निकले

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